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जब
कॉमरेड लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी रूसी क्रांति को अंजाम देने
के लिए मार्क्सवाद को व्यवहार में लागू करने के क्रम में सर्वहारा वर्ग का
नेतृत्व प्रदान करने में जी-तोड़ मेहनत कर रही थी, तब उनको हरेक मोर्चे पर
हमलों का सामना करना पड़ा। ख़ासकर जब 1905 की क्रांति असफल होने के बाद
अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी तत्वों के ख़िलाफ़ लड़ते हुए एक नए प्रकार
की बोल्शेविक पार्टी का निर्माण करने का महान ऐतिहासिक कार्यभार कॉमरेड
लेनिन ने अपने हाथ में लिया, तब इन अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी तत्वों
ने कॉमरेड लेनिन के ख़िलाफ़ एक भीषण अभियान चलाया। वे अलग-अलग प्रकार के
आरोप लगाकर कॉमरेड लेनिन और बोल्शेविक पार्टी के अन्य नेताओं को बदनाम करने
का काम करते थे। मालेमा सिद्धांत पर आधारित एक सही क्रांतिकारी लाइन और
लौह अनुशासन युक्त सच्ची बोल्शेविक पार्टी के निर्माण को रोकने के लिए
मेंशेविकों ने कॉमरेड लेनिन पर निरंकुशवादी और तानाशाह होने का आरोप लगाया।
मेंशेविक दावा करते थे कि वे पार्टी निर्माण के नाम पर उनसे असहमति रखने
वालों को पार्टी से बाहर कर अंधभक्तों का एक समूह बनाना चाहते हैं, जो
सिर्फ़ उनके विचारों का अनुसरण करे। कॉमरेड लेनिन द्वारा विघटनवादी तत्वों
के साथ किसी भी प्रकार की एकता से मनाही के कारण उन पर एक ऐसे
संकीर्णतावादी और गुटबाज़ होने का टैग लगाया गया। यही नहीं, बल्कि जुलाई
1917 के दिनों में पेत्रोग्राद में हुए हिंसक प्रदर्शनों के दौरान रूस की
अस्थायी सरकार ने कॉमरेड लेनिन को जर्मन जासूस क़रार दिया। इससे भी आगे
बढ़कर, 1917 में कॉमरेड लेनिन और उनकी बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में
दुनिया को हिला देने वाली अक्टूबर क्रांति के संपन्न होने के कुछ महीनों
बाद, एक अवसरवादी गुट ने उनकी हत्या का षड्यंत्र रचकर 30 अगस्त 1918 को उन
पर जानलेवा हमला किया। ये अवसरवादी कॉमरेड लेनिन को न उस दिन मार पाए थे और
न ही आज मार पा रहे हैं। अनगिनत हमलों के बावजूद कॉमरेड लेनिन बिना रुके,
बिना थके आख़िर तक लड़ते रहे। कॉमरेड लेनिन आज दुनिया के सर्वहारा वर्ग और
कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के नेता, शिक्षक और मार्गदर्शक बनकर दुनिया की
कम्युनिस्ट क्रांति को मार्गदर्शन प्रदान करने का काम कर रहे हैं। भारत में
भाकपा (माओवादी) के नेतृत्व में जारी महान क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन
भी इन्हीं के मार्गदर्शन में आगे बढ़ रहा है। कॉमरेड लेनिन द्वारा
1906-1914 के दरमियान किए गए संघर्ष से विशेष तौर पर सीख लेकर मौजूदा दौर
में भाकपा (माओवादी) अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद के ख़िलाफ़ भीषण अभियान
छेड़ा हुआ है। अगस्त 2024 में पार्टी के नवनिर्धारित केंद्रीय कार्यभार की
रोशनी में एक के बाद एक अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी तत्वों को पार्टी से
बाहर निकालकर एक लेनिनवादी कार्यशैली पर आधारित पार्टी निर्माण का
कार्यभार पार्टी नेतृत्व ने अपने हाथों में लिया है। इसीलिए यह कहना कोई
अतिशयोक्ति नहीं होगा कि कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों और
अवसरवादियों-विघटनवादियों-संशोधनवादियों के बीच का दो लाइनों का संघर्ष
युद्ध के स्तर पर चल रहा है। इस संघर्ष की कड़ी में हाल ही में जब पार्टी
द्वारा सीमा और विश्वविजय को उनके द्वारा अंजाम दी गई विघटनवादी गतिविधियों
के कारण पार्टी से बाहर निकालकर जनता के बीच भंडाफोड़ किया गया और जनता के
सक्रिय तत्वों द्वारा पार्टी की इस कार्रवाई का समर्थन किया गया, तो
क्रांतिकारी खेमे में कुछ सवाल उठ खड़े हुए हैं जिनका जवाब ढूँढ़ने का
प्रयास यहाँ हम करेंगे।
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रावी से गंगा: भाषा बदली, इलाके बदले, पर बदली नहीं विघटनकारियों की करतूत:
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मौजूदा
दौर में भारत का क्रांतिकारी आंदोलन और इसका नेतृत्व करने वाली पार्टी भीषण
संकट का सामना कर रहे हैं। ऑपरेशन कगार के तहत भारतीय राज्य द्वारा चलाए
गए भीषण दमन के बीचों-बीच एक तरफ़ अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी गद्दारों
का उभार और दूसरी तरफ़ भाकपा (माओवादी) द्वारा नेतृत्व को खो देने के कारण
यह संकट प्रमुखतः उभरकर सामने आया है। जिनको कम्युनिस्ट क्रांतिकारी अपनी
पार्टी कतारों में गिनते रहे और उन्हें अपनी ताक़त समझते रहे, वे निम्न
पूंजीपति वर्गीय तत्व समय आने पर पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए और शासक वर्ग की
गोदी में जाकर बैठ गए। जब सर्वहारा वर्ग ने इन निम्न पूंजीपति वर्गीय
तत्वों से क़ुर्बानी की माँग की तब ये मालेमा और उस पर आधारित भाकपा
(माओवादी) के झंडाबरदार बनने की बजाय गद्दार बने। वेणुगोपाल, सतीश, देवजी,
बलराज, राजू उर्फ़ केपी, जोगिंदर सिंह जैसे गद्दार इसके उदाहरण हैं। हाल ही
में भाकपा (माओवादी) द्वारा जारी प्रेस बयान में की गई घोषणा के बाद इसमें
दो और नए नाम सीमा और विश्वविजय इसके ताज़ा उदाहरण हैं। जिन्हें हम भेड़
समझकर कुल गिनती करते रहे, वे तो भेड़ की खाल ओढ़े भेड़िये थे। इसीलिए, अब
पार्टी ने भेड़ों के झुंड में से भेड़ की खाल ओढ़े भेड़ियों को अलग करने का
विशेष अभियान चलाया हुआ है ताकि क्रांतिकारी आंदोलन को संकट से बाहर
निकाला जा सके।
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जब से
भाकपा (माओवादी) ने विघटनवादी सीमा और विश्वविजय को निकालकर उनकी असली
सच्चाई सारे कम्युनिस्ट क्रांतिकारी खेमे में पेश की है, तब से यह सवाल
व्यापक पैमाने पर उठ खड़ा हुआ है कि सीमा और विश्वविजय को ग़द्दार कहना
क्या सही है? और भी मौलिक रूप में यह सवाल इस रूप में उठ रहा है कि ग़द्दार
किसे कहेंगे? अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद के ख़िलाफ़ इस लड़ाई में यह सवाल
आज के समय का सबसे विवादास्पद बन गया है। मोटे तौर पर कम्युनिस्ट
क्रांतिकारी आंदोलन में कुछ लोग ग़द्दार केवल उसे मानते आए हैं जिसने
सरेंडर के दौरान पार्टी की गोपनीय जानकारियाँ और हथियार आदि दुश्मन को सौंप
देने का काम किया हो या पार्टी नेताओं की मुख़बिरी करके गोपनीय ख़बर
दुश्मन को देकर हत्या/गिरफ़्तारी करवाई हो। वेणुगोपाल द्वारा हथियारों के
साथ सरेंडर कर देना, दूसरे साथियों को पार्टी निर्णय का दावा बताकर सरेंडर
करने के लिए तैयार करना और पार्टी लाइन पर हमला बोलना ग़द्दारी है—इस पर सब
एकमत हैं। अक्टूबर 2025 में वेणुगोपाल के द्वारा की गई ग़द्दारी एक उच्चतम
कोटि की ग़द्दारी है। वेणुगोपाल ने ग़द्दारी का एक नया कीर्तिमान रच दिया
है। वेणुगोपाल द्वारा की गई ग़द्दारी पर जनताना अदालत द्वारा उचित कार्रवाई
नहीं कर पाना आज पूरे क्रांतिकारी खेमे को चुभता है। नतीजतन, अब कुछ लोग
इस स्तर की ग़द्दारी को ही ग़द्दारी समझने की भूल करने लगे हैं। जब
स्टूडेंट फ़ॉर सोसाइटी-एसएफ़एस (Students for Society — SFS) ने विघटनकारी
हरमन के ख़िलाफ़ संघर्ष किया तो कुछ लोग बोल रहे थे कि हरमन क्या इतना बड़ा
है कि उसे ग़द्दार बोला जाए, हरमन क्या इतना बड़ा है कि उसकी तुलना
वेणुगोपाल से की जाए, हरमन क्या इतना बड़ा है कि उसके ख़िलाफ़ जनता में
स्टेटमेंट डाली जाए। स्टूडेंट फ़ॉर सोसाइटी-एसएफ़एस (Students for Society —
SFS) ने इसका बहुत ही मज़बूती से जवाब देते हुए कहा कि वेणुगोपाल झूठ
बोलकर हथियार और कार्यकर्ताओं को लेकर गया है और हरमन हमारा फ़ेसबुक पेज
लेकर गया है। जिसके जितना बस का था, उसने उतना किया। वेणुगोपाल बड़ा
ग़द्दार था तो उसने बड़ी ग़द्दारी की, हरमन छोटा ग़द्दार था तो उसने छोटी
ग़द्दारी की। ग़द्दारी तो की ही है ना? ग़द्दारी तो ग़द्दारी है—चाहे छोटी
हो या बड़ी। यह सबको समझ आया कि हरमन ने ग़द्दारी तो की है। परिणामस्वरूप,
अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी ग़द्दारों का दुष्प्रचार नहीं चला। अधिकतर
लोग हरमन के विघटनवाद से बाहर निकलकर क्रांतिकारी आंदोलन के समर्थन में आए।
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ऊपर दिए
विवरण से गद्दारी का स्तर छोटा और बड़ा या कम और ज्यादा होने का तो पता
चलता है, लेकिन गद्दारी किसे कहें – यह अभी भी स्पष्ट नहीं हुआ। यह स्पष्ट
रूप से कॉमरेड लेनिन द्वारा बताया गया है:
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“विघटनवादी निम्न बुर्जुआ बुद्धिजीवी हैं, जिन्हें पूंजीपति वर्ग द्वारा मजदूरों के बीच उदार भ्रष्टाचार बोने के लिए भेजा गया है। विघटनवादी मार्क्सवाद के गद्दार और लोकतंत्र के गद्दार हैं। उनके मामले में “एक खुली पार्टी के लिए संघर्ष” का नारा (जैसा कि उदारवादियों और नरोदनिकों के मामले में होता है) केवल अतीत के उनके त्याग और मजदूर वर्ग के साथ उनके टूटने को छिपाने का काम करता है।“
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(कॉमरेड लेनिन द्वारा लिखित लेख ‘विवादास्पद मुद्दे: एक खुली पार्टी और मार्क्सवादी‘ से)
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विघटनवादी
और गद्दार आज के समय के पर्यायवाची हैं। जो विघटनवादी हैं, वे गद्दार भी
हैं। गद्दारी सिर्फ दुश्मन को हथियार सौंपकर उसके सामने घुटने टेकना नहीं
है। पार्टी लाइन के खिलाफ काम करना, उसे विखंडित करने का प्रयास करना और
पार्टी के भूमिगत अस्तित्व को नष्ट कर देना भी गद्दारी है। यह केवल वही
आत्मसात कर सकता है जो क्रांति को सफल बनाने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के
इस महत्व को बखूबी समझता हो कि क्रांति से पहले, क्रांति के दौरान और
क्रांति के बाद साम्यवाद कायम करने के ऐतिहासिक संघर्ष में कम्युनिस्ट
पार्टी सर्वहारा वर्ग की हिरावल भूमिका अदा करती है।
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पर
ग़ज़ब बात यह है कि विघटनवादी बोलने से ज़्यादा बवाल गद्दार बोलने पर हो
रहा है। ऐसा इसीलिए है क्योंकि गद्दार बोलते ही देश की व्यापक आबादी बिना
देर किए इनके बारे में समझ जाएगी और उसका सामाजिक रूप से बहिष्कार कर देगी।
पर वह दिन दूर नहीं है, जब भारत की व्यापक जनता विघटनवाद के बारे में समझ
लेगी और बड़े से बड़े विघटनवादी को भी सबक सिखाएगी। इन गद्दारों का यह भ्रम
भी जल्दी ही दूर होगा।
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अब बात
सीमा और विश्वविजय की आती है। इनके संदर्भ में भी ऐसे उपरोक्त सवाल उठ रहे
हैं। सीमा और विश्वविजय की अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी लाइन के बहकावे
में आए कुछ तत्व बोल रहे हैं कि इनको गद्दार बोलना क्या सही है? क्या लाइन बनने से पहले ही पार्टी द्वारा इनका भंडाफोड़ कर देना गलत नहीं है? क्या ये काउत्सकी जितने बड़े हैं कि इनके खिलाफ पार्टी द्वारा अभियान लिया जाए? क्या इनके ख़िलाफ जनता में प्रेस बयान देना सही है? क्या पार्टी द्वारा स्टेटमेंट में You/तुम कहकर पर्सनल कमेंट करना चाहिए था? क्रांतिकारी आंदोलन उफान पर होने की स्थिति से पहले इस प्रकार का अभियान लेकर सीमा–विश्वविजय को निकालना क्या सही है? सारे लोग हमारे खिलाफ क्यों हैं? जनसंगठन द्वारा सीमा और विश्वविजय के खिलाफ स्टैंड लेना क्या सही था?
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हम इन सवालों को एक-एक कर देखेंगे।
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सबसे
पहले, सीमा और विश्वविजय को गद्दार बोलना सही है या गलत?— जितनी बार पार्टी
संकट के समय यह सवाल हमारे सामने खड़ा होगा, हमें उतनी बार रूसी सामाजिक
जनवादी मज़दूर पार्टी (RSDLP) के 1908 के सम्मलेन में पारित विघटनवाद की
परिभाषा को देखना चाहिए जिसके अनुसार– “पार्टी बुद्धिजीवियों के एक समूह द्वारा पार्टी के मौजूदा संगठन को विघटित करना (यानि, विघटन, विनाश, उन्मूलन, खत्म करना) और उसे हर कीमत पर, यहाँ तक कि पार्टी के कार्यक्रम, रणनीति और परम्पराओं (यानि, पिछले अनुभव) को त्याग देने के लिए दाँव पर लगाकर, कानूनी रूप से काम करने वाले (यानि, कानून के अनुरूप, ‘खुलेआम’ मौजूद) एक ढीले–ढाले संगठन में तब्दील करने का प्रयास करना विघटनवाद है ।”
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इसे और विस्तार से समझने के लिए कॉ. लेनिन ने अपने लेख में इस निर्णय की व्याख्या कुछ इस प्रकार की है कि “इसका सार है – भूमिगत (UG) संगठन का त्याग, उसका विघटन और हर कीमत पर उसे कानूनी रूप से काम करने वाले एक अव्यवस्थित संगठन में तब्दील कर देना…. बेशक, विघटनवाद का वैचारिक सम्बन्ध भगौड़ावाद (गद्दारी) से है, कार्यक्रम और रणनीति के त्याग से है, अवसरवाद से है…. विघटनवाद अवसरवाद का वह प्रकार है जो पार्टी के त्याग तक जाता है ।”
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विघटनवाद को एक लाइन में समझने के लिए कॉमरेड लेनिन द्वारा लातवियाई इलाके की चौथी कांग्रेस के लिए प्लेटफॉर्म मसौदा में बताया गया है कि “भूमिगत कामकाज को कमतर समझना विघटनवाद है।”
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अब सवाल
यह बनता है कि सीमा और विश्वविजय को विघटनवादी का तमगा दिया जा सकता है या
नहीं? क्या सीमा और विश्वविजय दोनों ने मिलकर कम्युनिस्ट पार्टी को विघटित
करने का प्रयास नहीं किया? गद्दार सीमा और विश्वविजय ने भूमिगत कामकाज को
कमतर समझने की जुर्रत की है। एक लाइन बनने के लिए एक विचारधारा, एक
कार्यक्रम और एक संगठनात्मक ढ़ांचे की ज़रुरत होती है। गद्दार सीमा और
विश्वविजय साल 2024 से ही इन तीनों पर काम कर रहे थे। इन्होंने 2007 की
एकता कांग्रेस-नौवी कांग्रेस में पारित लाइन से हटकर संशोधनवाद (शासक
वर्गीय विचारधारा, ब्राहमणवाद और उत्तर आधुनिकतावाद पर आधारित) को वैचारिक
आधार के रुप में, खुले कानूनी, अर्थवादी, सुधारवादी जनांदोलनों को
कार्यक्रम के रूप में और पार्टी विरोधी सांगठनिक ढांचे को खड़ा करके पार्टी
के समानांतर लाइन ली। सीआईए एजेंट से मिलकर क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व
कर रही पार्टी के खिलाफ क्रांतिकारी पांतों को गुमराह करने का कुप्रयास
किया। विस्तार से इनकी विघटनकारी करतूतों का सारा चिट्ठा भाकपा (माओवादी)
की उत्तर तालमेल कमेटी (एनसीसी) द्वारा जारी प्रेस ब्यान में दर्ज है। क्या
सीमा और विश्वविजय और यहाँ तक कि उनका साथ देने वाला कोई भी विघटनकारी
पार्टी द्वारा जारी प्रेस बयान का सिलसिलेवार ढ़ंग से राजनीतिक जवाब देने
की हिम्मत कर सकता है? गद्दार सीमा और विश्वविजय द्वारा पार्टी का सदस्य
होने से ही इंकार करने के बाद यह बात तो साफ हो गई है कि इन दोनों गद्दारों
में भाकपा (माओवादी) के प्रेस बयान का सिलसिलेवार ढंग से राजनीतिक जवाब
देने की हिम्मत कदापि नहीं है। कॉमरेड लेनिन ने अपने ‘दूसरे इंटरनेशनल का
पतन’ लेख में कहा है कि “…जब कई बटालियनें शत्रु के पक्ष में चली गई हों,
तो उनके नाम लिए जाने चाहिए और उन्हें गद्दार के रूप में कलंकित किया जाना
चाहिए…” इसीलिए, कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों को सीमा और विश्वविजय को भी
गद्दार विघटनकारी बोलने से नहीं हिचकना चाहिए।
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पार्टी
के अंदर दो लाइनों के बीच संघर्ष में अवसरवादी और मार्क्सवादी लाइन के बीच
फ़र्क का पता हम कॉमरेड माओ द्वारा बताई गई इन तीन महान कार्यशैलियों
(सिद्धांत और व्यवहार का मिलान, जनता के साथ घनिष्ठ संबंध और
आत्मालोचना-आलोचना) के द्वारा लगा सकते हैं। इन तीन महान कार्यशैलियों की
कसौटी पर रखकर सीमा और विश्वविजय को संक्षेप में एक-एक कर देखेंगे।
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- गद्दार सीमा और विश्वविजय के
सिद्धांत और व्यवहार में ज़मीन आसमान का फ़र्क था। एक तरफ सीमा देशभर में
घूमकर क्रांतिकारी आंदोलन के नाम पर खूब वाहवाही लूटने के लिए मुँह से
बड़े-बड़े दावे करती थी जबकि व्यवहार में पार्टी विचारधारा, राजनीति और इस
पर आधारित पार्टी अनुशासन से अपने आपको आज़ाद समझती थी और दूसरी तरफ
विश्वविजय “जी” दूसरे साथियों को बोलते नहीं थकते थे कि “कॉमरेड माओ आईना
दिखाने का काम करते हैं” पर कॉमरेड माओ द्वारा दिखाए गए आईने में खूद अपनी
अवसरवादी तस्वीर नहीं देखते थे, नतीजतन ये विघटनवाद के दलदल में जा गिरे।
- जनता के साथ घनिष्ठ संबंध
बनाने में दोनों को बहुत दिक्कत होती थी। आप उनकी फेसबुक प्रोफाइल निकालकर
देखें और स्क्रोल करते जाइए। यकीन मानिए आप इसी नतीजे पर पहुँचेंगे। उनके
लिए भूमिहीन और गरीब किसानों के बीच कार्य करना बहुत ही बोरियत भरा काम था।
मज़दूर बस्तियों की गलियों और मज़दूरों के कमरों में उनको घुटन होती थी।
उन्होंने अपनी निम्न पूंजीपति वर्गीय कंफर्ट जीवन को कभी नहीं छोड़ा।
साथियों से विशेष सुविधाओं की शिकायत करना और आवभगत करने की चाहत यह दिखाता
है। कॉमरेड माओ ने कहा था कि केवल वही असली क्रांतिकारी है जो गाँव के
भूमिहीन और गरीब किसानों के साथ घुलमिल सके। कॉमरेड माओ द्वारा दी गई इस
सीख को उन्होंने कभी भी जीवन में नहीं अपनाया क्योंकि भूमिहीन और गरीब
किसानों के साथ घुलमिल पाना उनके लिए सिर्फ कल्पनाओं के अलावा कुछ और नहीं
रहा। इसके विपरीत, वे अर्धऔपनिवेशिक-अर्धसामंती न्याय व्यवस्था के साथ
घनिष्ठ संबंध बनाकर कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों और जनवादी पत्रकारों के
खिलाफ कानूनी कार्रवाई में जिस तरह लिप्त हो गए हैं, ऐसी स्थिति में इनका
एनआरबी रिवाइवल केस में सरकारी टुकड़खोर बन जाना कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी
चाहिए। नतीजतन, इस कसौटी पर भी ये दोनों फेल कर गए।
- आत्मालोचना-आलोचना के जरिए
अपने व्यवहार को क्रांति की सेवा के लिए उन्नत करना इन दोनों ने कभी नहीं
सीखा। उन्होंने पार्टी के साथ लंबे समय तक तालमेल नहीं करने और लंबे समय तक
पार्टी ढांचे में नहीं बैठने की विघटनकारी होने की कसम खा ली थी। पार्टी
ढांचे में आत्मालोचना-आलोचना के जरिए मसलों को हल करना तो दूर की बात है।
इस बात में कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि एक कम्युनिस्ट क्रांतिकारी होने
के लिए कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य होना अनिवार्य है और पार्टी सदस्य होने
के लिए पार्टी ढांचे में नियमित बैठना अनिवार्य है। यानी कि जो कोई भी
पार्टी ढांचे में नहीं बैठेगा, वह और कुछ भी हो सकता है, लेकिन कम्युनिस्ट
क्रांतिकारी नहीं हो सकता। एक निम्न पूंजीपति वर्गीय तत्व का यह लक्षण होता
है कि वह अपने आपको कम्युनिस्ट क्रांतिकारी की सूची में भी रखना चाहता है,
लेकिन ढांचे में बैठने की चुनौतियों का सामना करने से भी डरता है। यह सीमा
और विश्वविजय पर भी हूबहू लागू होता है। इसके साथ-साथ जब-जब साथियों के
द्वारा इनकी आलोचना की जाती थी, तब-तब ये सामंती घमंड में चूर हो जाते थे
और किसी साथी द्वारा आलोचना करने पर उसे हमले के रूप में लेते थे। आखिर
में, आलोचना करने वाले साथियों को ही अलग-थलग करने की मंशा से दुष्प्रचार
करते थे। साथ ही, सामंती इमोशन का इस्तेमाल करके अपनी आलोचना से बचने की
जादूगरी करते रहते थे।
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सीमा और
विश्वविजय एक-एक करके तीनों महान कार्यशैलियों में फेल कर गए और इन दोनों
ने तीन घटिया दर्जे की कार्यशैलियाँ (मुँह में मार्क्सवाद पर बगल में
विघटनवाद, चंद झोलाछाप लिबरल बुद्धिजीवियों में उठक-बैठक करना और सामंती
घमंड में चूर होकर अपने आपको राजा और बाकी सबको बाजा समझना) अपनाकर
क्रांतिकारी आंदोलन के साथ गद्दारी की है। और गद्दारी करने वाले गद्दार ही
पुकारे जाएँगे। सीमा और विश्वविजय द्वारा अंजाम दी गई विघटनकारी करतूतों को
विस्तार से जानने के लिए ‘नज़रिया’ पत्रिका में हाल ही में छपा लेख पढ़ना
चाहिए। इस सबका सर्वहारा वर्ग के नज़रिए से गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने पर
कोई भी इसी नतीजे पर पहुँचेगा कि सीमा और विश्वविजय द्वारा अंजाम दी गई
गतिविधियाँ उनके अंदर मौजूद गैर-सर्वहारा रुझानों के कारण नहीं, किसी
मामूली भटकाव के कारण नहीं, बल्कि एक साफ़-स्पष्ट और समानांतर दिखने वाली
दक्षिणपंथी अवसरवादी लाइन के कारण हैं जो विघटनवाद तक का रास्ता तय कर चुकी
है। इसीलिए, हम कह सकते हैं कि किसी के द्वारा लाइन बनने से पहले ही सीमा
और विश्वविजय का पार्टी द्वारा भंडाफोड़ कर देने का दावा करना पूरी तरह गलत
है।
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ताज्जुब
की बात यह है कि भाकपा (माओवादी) के प्रेस बयान के तुरंत बाद गद्दार सीमा
और विश्वविजय द्वारा एनसीसी को स्टेट एजेंट बताए जाने और कम्युनिस्ट
क्रांतिकारियों और जनवादी पत्रकारों के खिलाफ मानहानि का केस फाइल करने
समेत तमाम हमलों के बावजूद इस तरह का सवाल करने की मंशा खुद एक सवाल बन गया
है जिसे कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों को पूछने का पूरा अधिकार है. वह सवाल
है-लाइन बनने से पहले सीमा और विश्वविजय का भंडाफोड़ करने को मौजूदा समय
में गलत बताने के पीछे की आखिर मंशा क्या है?
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क्या ये कौत्स्की जितने बड़े हैं कि इनके खिलाफ पार्टी द्वारा अभियान चलाया जाए? सीमा
और विश्वविजय कौत्स्की जितने बड़े नहीं, बल्कि गद्दार कौत्स्की के उन्नत
रूप हैं; क्योंकि कौत्स्की पूंजीवाद के शुरुआती चरण की पैदाइश था और अब
पूंजीवाद के उच्चतम चरण (साम्राज्यवाद) के दौर की पैदाइश सीमा और विश्वविजय
हैं। कौत्स्की ने मार्क्सवाद को विकृत करने का काम किया और सीमा व
विश्वविजय ने मार्क्सवाद के उन्नत रूप, ‘मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद’ को
विकृत कर पार्टी के भीतर संशोधनवादी राजनीति के तहत शासक वर्गीय विचारधारा
को संचारित करने का काम किया। इन्होंने अपने दादा कौत्स्की और बाप
ख्रुश्चेव के संशोधनवाद से सीखकर, क्रांति को संपन्न करने के लिए ज़रूरी
हथियारबंद संघर्ष को नकारकर शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर आधारित वर्गीय
समझौतावाद का रास्ता अख्तियार किया। साम्राज्यवाद के दौर में वास्तविक
भौतिक हकीकत बदलने के कारण, एक अर्ध-औपनिवेशिक और अर्ध-सामंती भारतीय समाज
में अब सीमा और विश्वविजय के पास ब्राह्मणवाद और उत्तर-आधुनिकतावाद के रूप
में वैचारिक हथियार हैं। इसके साथ-साथ, फेसबुक और वाट्सऐप आदि भी हथियार के
रूप में मौजूद हैं (जो कि कौत्स्की के पास नहीं थे), जिनके ज़रिए वे
पार्टी-विरोधी, क्रांति-विरोधी और जन-विरोधी गतिविधियाँ अंजाम दे रहे हैं।
यह सवाल अपने आप में इनके बौद्धिक दिवालियेपन को दिखाता है और इनकी वर्गीय
स्थिति को स्पष्ट करता है। मध्यम किसानी तबके अपनी वर्गीय स्थिति के कारण
सामंती ताकतों से लड़ने के नाम पर भूमिहीन और गरीब किसानों को ही कोसने
लगते हैं। वे सामंती बड़े ज़मींदार वर्ग के खिलाफ लड़ने को व्यर्थ व छोटा
दिखाने के लिए कुचालें चलते हैं। मध्यम किसानी तबके के ये तत्व कम्युनिस्ट
क्रांतिकारी आंदोलन में विघटनवादी तत्वों के खिलाफ लड़ने को व्यर्थ और छोटा
दिखाने का कुप्रयास कर रहे हैं ताकि लड़ना ना पड़े और अपनी चमड़ी बचाई जा
सके।
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क्या सीमा और विश्वविजय के खिलाफ प्रेस बयान देना सही है? यदि
यह सवाल उनके गद्दार/विघटनकारी होने या न होने से, या फिर इनके कौत्स्की
जितने बड़े बनने तक अभियान चलाने से जुड़ा है, तो हम इस पर ऊपर अपनी
प्रतिक्रिया दे चुके हैं। कोई भी जब सीमा और विश्वविजय को गद्दार के रूप
में और आज कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आंदोलन में कौत्स्की के उन्नत रूप में
देखेगा, तो इस नतीजे पर पहुँच ही जाएगा कि इनके खिलाफ प्रेस बयान जारी कर
जनता के बीच स्थिति स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है; क्योंकि यदि इनके खिलाफ
औपचारिक घोषणा कर स्थिति साफ नहीं की जाती, तो ये कम्युनिस्ट क्रांतिकारी
खेमे में पार्टी के नाम पर पार्टी-विरोधी गतिविधियों को अंजाम देते। इस
तथ्य की ओर ध्यान दिलाना ज़रूरी हो जाता है कि पार्टी द्वारा प्रेस बयान
जारी करने से पहले ये जगह-जगह घूमकर पार्टी के खिलाफ गतिविधियों को बखूबी
अंजाम देने का काम कर रहे थे। अब पार्टी द्वारा जारी प्रेस बयान के बाद,
सीमा और विश्वविजय को लेकर कोई भी दुविधा कम्युनिस्ट क्रांतिकारी खेमे में
नहीं बची है। अब ये कम से कम पार्टी के नाम पर पार्टी-विरोधी गतिविधियों को
अंजाम नहीं दे सकते। जो कोई भी इनके साथ संबंध रखेगा और अपने कम्युनिस्ट
क्रांतिकारी होने का दावा करेगा, उसका भी खुद-ब-खुद जनता के बीच भंडाफोड़
हो जाएगा। यह सवाल उठाने वालों को इस बात का भी डर हो सकता है।
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क्या पार्टी द्वारा स्टेटमेंट में You/तुम/जी कहकर पर्सनल कमेंट करना चाहिए था? एक
वर्गीय समाज में हर ‘पर्सनल’ चीज़ की अपनी राजनीति होती है। इसमें कोई भी
व्यक्ति विशेष किसी न किसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है और अपने वर्गीय
हितों को पूरा करने के लिए भरसक प्रयास करता है। इसीलिए यह एक नाजायज़ सवाल
है। पार्टी ने स्टेटमेंट में खुद-ब-खुद ही बताया है कि “बलराज अपने मन/शरीर में एक राजनीतिक शक्ति है और यह राजनीतिक शक्ति सर्वहारा वर्ग की लाइन की गद्दार है।”
ठीक इसी प्रकार, सीमा और विश्वविजय भी अपने मन/शरीर में एक राजनीतिक शक्ति
हैं और यह राजनीतिक शक्ति सर्वहारा वर्ग की लाइन की गद्दार है। जो भी
सर्वहारा वर्ग के खिलाफ है, उसके खिलाफ होना कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों का
फ़र्ज़ है। इसीलिए, सर्वहारा वर्ग तथा व्यापक जनता को गद्दार सीमा और
विश्वविजय की अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी लाइन के खिलाफ लड़ने के लिए हर
संभव तरीका अपनाने से हिचकना नहीं चाहिए। किसी भी तरह की हिचकिचाहट
उदारतावाद से आती है, और उदारतावाद से आता है दक्षिणपंथी अवसरवाद तथा
दक्षिणपंथी अवसरवाद से आता है विघटनवाद यानी गद्दारी।
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क्या क्रांतिकारी आंदोलन के भाटे की स्थिति में इस प्रकार का अभियान चलाकर सीमा-विश्वविजय को निकालना सही है? क्रांतिकारी
आंदोलन के भाटे की स्थिति में होने पर, इस प्रकार का अभियान चलाकर
सीमा-विश्वविजय और इनके जैसे तत्वों को निकालकर बाहर करना, क्रांतिकारी
आंदोलन को उफान तक ले जाने और उसे क्रांति में तब्दील करने की पूर्वशर्त
है। कॉमरेड लेनिन ने 1905 की क्रांति के असफल होने के बाद
अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद को ध्वस्त कर एक नए प्रकार की पार्टी (जिसे आज
हम सब लेनिनवादी पार्टी के रूप में जानते हैं) का निर्माण कर रूस में
क्रांति का नेतृत्व किया। क्रांतियाँ केवल वहीं संभव हो पाईं, जहाँ इस
प्रकार की पार्टी का गठन हो सका। चीन में कॉमरेड माओ के नेतृत्व में
क्रांति इसीलिए सफलतापूर्वक संपन्न हो पाई, क्योंकि कॉमरेड माओ ने
लेनिनवादी पार्टी का निर्माण कर चीन में क्रांति का नेतृत्व किया। ज़रा
बताएँ कि किस देश में क्रांति अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी तत्वों के
खिलाफ लड़े बिना संभव हो पाई है? आपको दुनिया के नक़्शे पर ऐसा कोई देश
नहीं मिलेगा। आज भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के अस्थायी सेटबैक का शिकार
होने के पीछे अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी तत्वों का बहुत बड़ा हाथ है।
इस पहलू को विस्तार से समझने के लिए ‘नज़रिया’ पत्रिका के अंक 6 में
प्रकाशित ‘कॉमरेड लेनिन की भूमिका’ से जुड़ा लेख और ‘क्रांतिकारी आंदोलन का
संकट और हमारे कार्यभार’ लेख पढ़ना चाहिए।
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जनसंगठन द्वारा सीमा और विश्वविजय के खिलाफ स्टैंड लेना क्या सही था? क्या इससे भूमिगत कार्यपद्धति का उल्लंघन नहीं हो रहा है? यह
सवाल उठाने के पीछे की साफ़ मंशा क्रांतिकारी जनसंगठनों को पंगु बना देने
की है ताकि वे क्रांतिकारी प्रचार-प्रसार न कर सकें। इस सवाल को सबसे पहले
उछालकर क्रांतिकारी कतारों में असमंजस की स्थिति पैदा करने का दुस्साहस रवि
नारला ने किया। रवि नारला ने सालों तक भाकपा (माओवादी) में भूमिगत रूप से
सक्रिय तौर पर काम किया। फिर वे गिरफ्तार हुए। उनकी गिरफ्तारी का कारण उनके
द्वारा भूमिगत कार्यपद्धति की सतही समझदारी ही रही होगी। फिर जेल से बाहर
आने के बावजूद पुनः भूमिगत न होना भी इसी बात का संकेत तो नहीं है? क्या वे
नहीं जानते कि क्रांतिकारी जनसंगठनों की नवजनवादी क्रांति में क्या भूमिका
होती है? वे क्रांतिकारी जनसंगठनों की भूमिका से जुड़ी 80-90 के दशक की
बहस को भूल गए हैं, जिसमें कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों द्वारा PDSU के
दक्षिणपंथी अवसरवाद के खिलाफ एक साफ़ विभाजन रेखा खींचकर रेडिकल स्टूडेंट
यूनियन की स्थापना की गई थी। यहाँ तक कि जिस पार्टी में रवि नारला ने सालों
काम किया, उस पार्टी की रणनीति-कार्यनीति में दिए गए जनसंगठनों के विवरण
को भी उन्होंने नज़रअंदाज़ कर दिया है। इसे नज़रअंदाज़ करने और भूलने के
पीछे की राजनीति क्या है? रवि नारला को कॉमरेड लेनिन का यह कथन नहीं भूलना
चाहिए कि अवसरवादियों को समर्थन देने वाले भी अवसरवादी ही होते हैं।
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सारे लोग हमारे खिलाफ क्यों हैं? सबसे
पहले तो यह बात साफ़ होना ज़रूरी है कि यह सरासर झूठ है कि सारे लोग हमारे
खिलाफ हैं, और तथ्यों का दुरुपयोग करके अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद के
खिलाफ संघर्ष करने वाले कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों को हतोत्साहित करने का
काम किया जा रहा है। जबकि भौतिक हक़ीक़त यह है कि कम्युनिस्ट क्रांतिकारी,
हमदर्द और जनता की बहुसंख्यक आबादी अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद के खिलाफ
संघर्ष में एकजुट होने की प्रक्रिया में है। क्या हम सबको भारत की सरज़मीं
पर यह प्रक्रिया होती नहीं दिख रही है? हम देख रहे हैं कि एक तरफ़, क्रांति
करने के लिए निम्न पूंजीपति वर्ग का क्रांतिकारी हिस्सा या तो पार्टी में
अपना सर्वहाराकरण करने में लगा है या फिर पार्टी से जुड़ने के क्रम में है,
वहीं दूसरी तरफ़ भगौड़े प्रतिक्रियावादी निम्न पूंजीपति वर्गीय तत्वों के
खिलाफ कम्युनिस्ट पार्टी के द्वारा संघर्ष जारी है। ऐसे भगौड़े निम्न
पूंजीपति वर्गीय बुद्धिजीवियों की चीख-पुकार को ही कम्युनिस्ट पार्टी के
सही या गलत होने का एकमात्र पैमाना कैसे मान लिया गया? क्या बाहर वाले सीमा
और विश्वविजय, कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा अंदर से बाहर निकाले गए सीमा और
विश्वविजय के खिलाफ जारी संघर्ष के बारे में पूर्वाग्रह-रहित नतीजे पर
पहुँच सकते हैं? इसका जवाब है ‘नहीं’; क्योंकि इनकी जड़ें बर्नस्टीन से
जाकर मिल जाती हैं। पार्टी सही है या गलत, इसका पैमाना ये प्रतिक्रियावादी
तत्व नहीं हो सकते। इसका पैमाना यह होना चाहिए कि कम्युनिस्ट पार्टी शासक
वर्ग को जड़-मूल से उखाड़ने के क्रम में अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद के
खिलाफ लड़कर नवजनवादी क्रांति को सफल बनाने के लिए दीर्घकालीन लोकयुद्ध के
रास्ते पर आगे बढ़ रही है या नहीं। विशेष तौर पर बात करें तो,
अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद के खिलाफ इस चरण में कम्युनिस्ट पार्टी की
सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि अवसरवादी-विघटनवादी-संशोधनवादी तत्वों को
पार्टी से निकालकर बड़ी तादाद में भूमिगत पार्टी कार्यकर्ता और नेतृत्व
तैयार किए जाएँ।
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क्रांति
के सफल होने तक क्रांतिकारी आंदोलन को नेतृत्व देने वाली पार्टी कमज़ोर
स्थिति में ही रहेगी। शासक वर्ग का प्रभाव ही व्यापक जनता में प्रचलित होता
है। कम्युनिस्ट पार्टी और क्रांतिकारी आंदोलन के मज़बूत होने के साथ-साथ
व्यापक जनता पर शोषक और उत्पीड़क वर्ग का प्रभाव कमज़ोर होगा। कम्युनिस्ट
क्रांतिकारियों को चाहिए कि वे व्यापक जनता को शामिल करने के नाम पर
अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष को कमज़ोर कर जनता के
पिछलग्गूपन का शिकार होने से बचें। इसीलिए सच्चे कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों
को अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद के खिलाफ इस संघर्ष में पलभर के लिए भी
हतोत्साहित हुए बिना, डटकर मुकाबला करना है; क्योंकि सर्वहारा के महान नेता
कॉमरेड लेनिन ने सिखाया है कि विघटनवाद के खिलाफ लड़ने की प्रक्रिया में
यदि एक भी मज़दूर समर्थन में न आए, तब भी हम विघटनवाद के खिलाफ मज़बूती से
लड़ते रहेंगे। कॉमरेड लेनिन से प्रेरणा लेकर कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों को
भी अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद के खिलाफ निर्मम संघर्ष जारी रखना चाहिए।
चाहे शासक वर्गीय एजेंट कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों को स्टेट एजेंट कहें,
तानाशाह कहें, संकीर्ण कहें या फिर कुछ और, इससे कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों
को नहीं घबराना चाहिए। इस संघर्ष की प्रासंगिकता पर सवाल उठाकर इसे
दरकिनार करने वालों को यह समझना ज़रूरी है कि किसी भी व्यक्ति विशेष की
सामाजिक-आर्थिक स्थिति से उसकी राजनीति और विचारधारा तय होती है। इसीलिए
उन्हें अपने सर्वहाराकरण पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देना चाहिए।
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यह लेख किशन द्वारा लिखा गया है। — सं. | | | | |
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